हनुमान जी को उनकी शक्ति किसने याद दिलाई? रामायण का वो रोचक प्रसंग, का चुप साधि रहेहु बलवाना
माता सीता की खोज में जामवंत जी और हनुमान जी के नेतृत्व में वानरों का एक दल समुद्र तट पर पहुंच गया था. लेकिन उनके समक्ष 100 योजन का विशाल समुद्र उनकी परीक्षा लेने के लिए खड़ा था. सबसे बड़ी समस्या यह थी कि समुद्र को लांघकर उस पार जाएगा कौन? हर कोई अपनी क्षमता के बारे में बताता, लेकिन कोई समुद्र पार करने का साहस नहीं दिखाता. ऐसी स्थिति में वानर दल निराश होकर समुद्र तट पर बैठ गया. हनुमान जी भी एक ओर बैठे हुए थे.
जामवंत जी ने याद दिलाई हनुमान जी की शक्ति
श्रीरामचरितमानस के किष्किंधाकांड में यह प्रसंग दिया गया है. वानर दल में जामवंत जी ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनको हनुमान जी की शक्तियों और क्षमताओं का ज्ञान था. उनको पता था कि हनुमान जी को बाल्यावस्था में ऋषियों का श्राप मिला था, जिसकी वजह से उनको अपनी शक्तियां भूल गई थीं. लेकिन ऋषियों ने कहा था कि जब कोई उनको शक्तियों का आभास कराएगा तो उनको उसका ज्ञान होगा और फिर वे अपना पराक्रम दिखाएंगे.
जामवंत जी को श्राप के बारे में पता था. तब ऐसे समय में जामवंत जी ने हनुमान जी को उनके अतुलित बल और पराक्रम के बारे में याद दिलाई. श्रीरामचरितमानस में लिखा है-
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥
पवन तनय बल पवन समाना।
बुद्धि बिबेक बिग्यान निधाना॥
कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम पाहीं॥
जामवंत जी कहते हैं कि हे हनुमान! आप चुपचाप क्यों बैठे हो? आप तो पवनपुत्र हो, आपका बल पवन के समान ही अपरंपार है. आपके पास बुद्धि, विवेक और विज्ञान का भंडार है. इस संपूर्ण संसार में ऐसा कौन सा कठिन काम है, जो आपके लिए असंभव है?
छलांग लगाकर पार किया समुद्र
जामवंत जी की इन बातों को सुनते ही हनुमान जी को अपनी समस्त शक्तियों का स्मरण हो गया. उनके शरीर के अंदर अपार शक्तियां प्रवाहित होने लगीं. देखते ही देखते उन्होंने पर्वत के समान विशाल रूप धारण कर लिया. फिर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम के नाम का स्मरण करके एक छलांग लगाई आर समुद्र पार करने के लिए लंकी की ओर उड़ चले.
फिर हनुमान जी ने अशोक वाटिका में माता सीता की खोज की. प्रभु राम के संदेश को उन तक पहुंचा और लंका दहन करके रावण को उसकी गलती का एहसास कराया. उसके बाद वे माता सीता का चूड़ामणि लेकर आए और प्रभु राम को दिया, ताकि उनको विश्वास हो जाए कि वे सीता जी से मिलकर आए हैं.

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